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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 60, Verses 15–16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 60, verses 15–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 15,16

संस्कृत श्लोक

प्रसुप्तवासनाजालजीवतागर्भपञ्जरम् । अधितिष्ठति बीजश्रीः सुप्तपत्रा यथा वटम् ॥ १५ ॥ यथा काष्ठे स्थितश्चाग्निर्यथा मृदि घटाः स्थिताः । अनेकक्रमयोगेन परागत्य महेश्वरात् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे अंकुर, शाखा, पत्ते जिसमें आविर्भूत नहीं हुए, ऐसा वट वृक्ष का बीज, शाखा, अंकुर, पत्ते और फल से युक्त वट वृक्ष में रहता है, जैसे काष्ठ में अग्नि स्थित रहती है और जैसे मिट्टी में घड़े स्थित रहते है वैसे ही जीवता, जिसकी वासनां सुप्त रहती हैं, गर्भरूपी पिंजडे मेँ स्थित रहती है । केवल गर्भ में ही मूर्छित जीवपरम्पराओं का अन्य के आश्रय द्वारा तिरोधान नहीं होता, किन्तु प्रलय के समय उपाधि का नाश होने के कारण प्राप्त हुए अव्यक्त से निकल कर आकाशरूप मे, लिंग शरीर के आरम्भ समय में और चन्द्रकिरण आदि में प्रवेश करने के समय में भी तिरोधान से स्थिति रहती हे