Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 62, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 62, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
धैर्येणाभ्युद्धरेद्बुद्धिं पङ्कान्मुग्धगवीमिव ।
तामसीं राजसीं चैव जातिमन्यामपि श्रितः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
पुरुष चाहे,
राक्षस, पिशाच, शूद्र आदि तामसी योनि में उत्पन्न हुआ हो, चाहे क्षत्रिय, वैश्य आदि राजस योनि को
प्राप्त हुआ हो अथवा सत्त्व, तम से मिश्रित सर्प आदि योनि को प्राप्त हो, उसे कीचड़ से भोली-भाली
गाय की तरह विषयों से बुद्धि का धैर्य के साथ उद्धार करना चाहिए