Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 62, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 62, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
हितं महासत्त्वतयात्मतत्त्वं विधाय बुद्ध्या भव वीतशोकः ।
तव क्रमेणैव ततो जनोऽयं मुक्तो भविष्यत्यथ वीतशोकः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
सब प्राणियों के आत्यन्तिक दुःख की निवृत्ति से उपलक्षित, निरतिशय आनन्दरूप
होने के कारण अत्यन्त हितकर इस उपदिष्ट आत्मतत्व को विशुद्ध सत््वगुणों की वृद्धि के उपाय में
सावधान बुद्धि द्वारा आत्मरूप से स्थिर करके आप शोकरहित होइए । तदनन्तर आपके द्वारा उपदिष्ट
क्रम से आपके ये ओर लोग भी मुक्त ओर शोकरहित हो जायेंगे