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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 7, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 7, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

तत्र तां मृगशावाक्षीं कान्तामध्यगतामसौ । ददर्श विपिनान्तस्थां भृगुश्चूतलतामिव ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्री शुक्राचार्यजी ने वन के मध्य में स्थित आम्रलता के समान वहाँ पर अप्सराओं के मध्य में बैठी हुई मृगनयनी उस पूर्वदुष्ट अप्सरा को देखा