Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 9, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 9, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
शरीररन्ध्रप्रवहद्वातसीत्काररूपया ।
चेष्टा दुःखक्षयानन्दात्काकल्येव प्रगायति ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
वह शरीर अभिमान दुःख के क्षय से प्राप्त आनन्द के कारण शरीर के छिद्रों मे बह रहे वायु से, बाँस के
छिद्रों में बह रहे वायु की वेणुध्वनि के तुल्य सीत्कारं से हुई काकली से (मीठी महीन तान से) देह की
ऐसी गति होती है, यों देह की चेष्टाओं को मानों गाता था