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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, Verses 30–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 1, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

रत्नांशुसलिलापूरमुखपद्मनिरन्तरा । पद्मिनीवालिवलिता नूपुरारवसारसा ॥ ३० ॥ संतता सा सभोत्तस्थौ भूभृच्छतसमाकुला । भूतसंततिसंभ्रान्ता सृष्टिर्नवमिवोदिता ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

रत्नों के किरणरूपी जलप्रवाह मेँ मुखरूपी कमलो से ठसा-ठस भरी हुई नुपुरो की ध्वनिरूपी सारसवाली ओर भँवरों से व्याप्त वह सभा कमलिनी के (कमल के तालाब के) सदृश थी । उसमें मणियों की किरणें ही जल प्रवाह के स्थानापन्न थी, लोगों के मुँह ही पद्मस्थानीय थे, नूपुरों की ध्वनियां ने ही सारसो का स्थान लिया था ओर भँवरे भी फूलों की मालाओं में मँडरा रहे थे; अतएव वह कमलिनी के तुल्य थी