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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, Verses 33–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 1, verses 33–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 33,34

संस्कृत श्लोक

सुमन्त्रो मन्त्रिणश्चैव वसिष्ठमथ भूमिपम् । प्रणम्य जग्मुः स्नानाय रसविज्ञानकोविदाः ॥ ३३ ॥ वामदेवादयश्चान्ये विश्वामित्रादयस्तथा । वसिष्ठं पुरतः कृत्वा तस्थुरावर्जनोन्मुखाः ॥ ३४ ॥ राजा दशरथस्तत्र पूजयित्वा मुनिव्रजम् । तद्विसृष्टो जगामाथ स्वकार्यार्थमरिन्दमः ॥ ३५ ॥ वनं वनास्पदा जग्मुर्व्योम व्योमनिवासिनः । नगरं नागराश्चैव प्रातरागमनाय ते ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

सुमन्त्र और अन्यान्य मन्त्री, जो ब्रह्मरस और जल के विहारज्ञान में बडे निपुण थे, श्रीवसिष्ठजी और राजा दशरथ को प्रणाम कर स्नान करने के लिए गये। वामदेव आदि और विश्वामित्र आदि अन्यान्य ऋषिगण श्रीवसिष्ठजी को आगे करके अनुज्ञा की प्रतीक्षा में खड़े रहे