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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, Verses 38–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 12, verses 38–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

प्रज्ञयेह जगत्सर्वं सम्यगेवाङ्ग दृश्यते । सम्यग्दर्शनमायान्ति नापदो नच संपदः ॥ ३८ ॥ पिधानं परमार्कस्य जडात्मा विततोऽसितः । अहंकाराम्बुदो मत्तः प्रज्ञावातेन बाध्यते ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, इस लोक में प्रज्ञा से सारा जगत गुण-दोष तत्त्वविवेक के साथ भलीभाँति दिखाई देता है । परमार्थदृष्टिवाले पुरुष के पास न सम्पत्तिर्यो आती हैं, न विपत्तियाँ ही आती हे । जैसे सूर्य को आवृत करनेवाला जलरूप विस्तृत काला मत्त मेघ वायु से छिन्न-भिन्न हो जाता हे वैसे ही परमात्मा को आवृत करनेवाला जडरूप विस्तृत मलिन मत्त अहंकार प्रज्ञा से नष्ट हो जाता है