Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 1-2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवं जनकवद्राम विचार्यात्मानमात्मना ।
पदं विदितवेद्यानामविघ्नेनाधिगच्छसि ॥ १ ॥
ये हि पाश्चात्यजन्मानः प्राज्ञा राजससात्त्विकाः ।
प्राप्नुवन्ति स्वयं प्राप्यं ते जना जनका इव ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्टजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार जनक के समान अपने से आत्मा का विचार
कर आप असम्भावना आदि प्रतिबन्धको के निरास द्वारा ज्ञातज्ञेय (जिन लोगों को ज्ञातव्य वस्तु का,
ब्रह्म का परिज्ञान हो चुका) लोगों के पद को पा जाओगे । जो लोग अन्तिम जीवन्मुक्ति जन्मवाले
प्रज्ञावान ओर राजस-सात्त्विक हैं, वे लोग जनक के समान प्राप्य वस्तु को स्वयं पा जाते हैँ । भाव यह
कि रजोगुण से पौरुष प्रयत्न होने ओर सत्त्वगुण से चित्तप्रसाद की अभिवृद्धि होने के कारण राजस-
सात्विक पुरुष ही अपने विवेक से आकाश से फल पतन के तुल्य ज्ञानप्राप्ति में अधिकारी हैं
सर्ग सन्दर्भ
बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग जनक के विचार को उदाहरण बनाकर चित्तके प्रशमन के उपायों का युक्तियों द्वारा विस्तारपूर्वक वर्णन |