Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 117
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 117 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 117
संस्कृत श्लोक
सुखलवविवशा द्विषेव तप्ता हृदयगतेन निजेन चेतसैव ।
विधुरितधिषणा न वेत्ति सत्यं तदपि कथं परिमोहितो मुधैव ॥ ११७ ॥
हिन्दी अर्थ
अव पूर्वोक्त दुष्प्रज्ञा भले ही उरे, तथापि उसके कारण पुरुष का व्यामोह उचित नहीं है, इस प्रकार
पूर्व प्रस्तुत ही उपसंहार करते हैं।
उक्त दुष्प्रज्ञा विषमिश्रित लङ्डु के आस्वादलेशरूप विषयसुख लेश से मरणासन्न-सी विवश,
शत्रु के समान प्रहार कर रहे हृदयगत चित्त से ही सन्तापित ओर विवेकबुद्धि से रहित है, अतः वह सत्य
वस्तुको बिलकुल नहीं जानती । इस प्रकार की भी उस प्रज्ञा से पुरुष व्यर्थ ही मोहित हुआ हे । भाव यह
है कि स्वच्छ चित्तवाले ओर स्वजनों से संतप्त विवेकबुद्धिवाले और सत्य स्व-रहस्य को जाननेवाले
शत्रु से मोह होना ठीक है, किन्तु उससे विपरीत दुष्प्रज्ञा से मोह होना ठीक नहीं हे