Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 115–116
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verses 115–116 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 115,116
संस्कृत श्लोक
विभेत्येषापि वीणायास्तन्त्रीगुणतनुध्वनेः ।
बन्धोरपि सनिद्रस्य विभेति वदनद्युतेः ॥ ११५ ॥
असतोऽपि जनादुच्चैर्गीताद्भीता पलायते ।
स्वेनैव मनसाप्यज्ञा किलैषा विवशीकृता ॥ ११६ ॥
हिन्दी अर्थ
वीणा की तन्त्री मधुर ध्वनि से भी यह डरती हे । निद्रायुक्तबन्धु की भी मुखकान्ति से
डरती है । भाव यह है कि धैर्य के हेतुओं का अभाव होने से वह सबसे डरती है । वंचक पुरुषों द्वारा "यह
तुम्हारा शत्रु आया", इस प्रकार ऊँचे स्वर से कहे गये अविद्यमान शत्रु से भयभीत होकर भागती हे । बहुत
क्या कहें अपने ही मन से भी यह विवश (भयभीत) की गईहै, अन्य से तो कहना ही क्या है 7