Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
उपादेयानुपतनं हेयैकान्तविवर्जनम् ।
यदेतन्मनसो राम तद्बन्धं विद्धि नेतरत् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उपादेय (ग्राह्य) विषयों मे मन का अनुराग ओर हेय (त्याज्य) विषयों मे मन का द्वेष ही पुरुष का
बन्धन है, उससे अतिरिक्त बन्धन नहीं है, ऐसा कहते हैं।
मन का जो उपादेय वस्तुओं की ओर आकृष्ट होना है ओर जो हेय वस्तुओं का सर्वथा त्याग हे,
उसीको आप बन्धन समझिये, उससे अतिरिक्त बन्धन नहीं