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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

तिष्ठन्गच्छन्स्वपञ्जाग्रन्निवसन्नुत्पतन्पतन् । असदेवेदमित्यन्तर्निश्चित्यास्थां परित्यज ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त ओर चेत्य इन दोनों के विस्मरण में उनके ऊपर आस्था का त्याग ही उपाय है, ऐसा कहते हैं । खड़े होते, चलते, सोते, जागते, रहते, उछलते, कूदते यह असत्‌ ही है, ऐसा मन में निश्चय कर इसमें आस्था का परित्याग कीजिये