Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
मोहो विस्मृत्य संसारं न भूयः परिरोहति ।
चित्तं विस्मृत्य संसारो न भूयः परिरोहति ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि पहले से सिद्ध मन का उक्त उपाय द्वारा विनाश होने पर भी भावी मनोवृत्ति
का कैसे विनाश होगा, तो इस पर कहते हैं।
वासनोच्छेदरूपी विस्मृति से उत्तरकाल में प्राप्त हुए वृत्ति रूप मन का विनाशकर वर्तमान मन का
भी कतकरेणु न्याय से मन से ही विनाशकर आप संसार का विच्छेद कीजिये ॥३ ६॥
यदि कोई शंका करे कि ऐसी अवस्था में भी तत्त्वज्ञानी के जीवन की सिद्धि के लिए जीवन के
मूलभूत अविद्यानामक मोह को अवश्य ही मानना पड़ेगा, वही फिर संसार को उत्पन्न करेगा, तो इस
पर कहते हैं।
मोह संसार को भूल कर फिर फिर नहीं उत्पन्न होता, भाव यह कि वासनाक्षयरूप विस्मृति होने
पर मोह में बीज शक्ति नहीं रह जाती ।
शंका : तब संसार ही मोहक्षेत्र में अपने आप उगेगा ?
समाधान : संसार चित्त का विस्मरण कर फिर नहीं उगता । भाव यह कि चित्तसंस्कारोच्छेदरूप
विस्मरण होने पर फिर संसार का उद्गम नहीं होता