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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 34–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verses 34–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

अस्य संसारवृक्षस्य मूलं दोषाङ्कुरास्पदम् । भव्यधीरेण धैर्येण प्रोद्धरोद्धुरया धिया ॥ ३४ ॥ मनसैव मनश्छित्त्वा कुठारेणेव पादपम् । पदं पावनमासाद्य सद्य एव स्थिरो भव ॥ ३५ ॥ मनसैव मनच्छित्त्वा विस्मृत्या चरमं मनः । वर्तमानमपि च्छित्त्वा च्छिन्नसंसारतां व्रज ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे सौम्य, चिर अभ्यास से दृढ़ हुए एकात्मस्थिरतारूप चित्त धेर्य से सम्पन्न अतएव अनादिकाल से संसारसागर में डूबे हुए आत्मा का उद्धार करने में समर्थ अपरोक्ष साक्षात्कार बुद्धि से संसाररूपी वृक्ष के मूल को, जो दोषरूपी अंकुरों की उत्पत्तिभूमि है, जैसे वृक्ष के अवयव काष्ठरूप कुल्हाड़े से वृक्ष काटा जाता है, वैसे ही मन से ही मन का विनाश कर शीघ्र ही परम-पवित्र स्थान को पाकर आप स्थिर होइये