Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 31–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 31-33
संस्कृत श्लोक
बाह्यानर्थानिमांस्त्यक्त्वा तिष्ठन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ।
सर्वथा सर्वदा सर्वानान्तरांश्च विचारय ॥ ३१ ॥
गृहीततृष्णाशफरि वासनाजालमाविलम् ।
संसारवारिप्रसृतं चिन्तातन्तुभिराततम् ॥ ३२ ॥
अनया तीक्ष्णया तात च्छिन्धि बुद्धिशलाकया ।
वात्ययेवाम्बुदं काले वहन्त्या वितते पदे ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस समय उक्त गुणों के अर्जन में उपाय का उपदेश देते हैं।
जैसे बह रहे जल को बाँध से रोकते हैं वैसे ही निकृष्ट विषयों में दौड़ रहे मन को विषयों से सब
बाह्नन्द्रियों की परावृत्ति द्वारा जबर्दस्ती रोके ॥ ३ ०॥
बाह्मपवार्थों में आत्मत्वभ्रान्ति नहीं हो सकती है अतः उनका रत्न की तत्त्व-परीक्षा के समान सदा
सब तरह विचार करना चाहिये, ऐसा कहते हैं।
इन बाह्य पदार्थों का त्याग करके आप बैठते, चलते, सोते सदा सब आन्तरपदार्थों का भली-भाँति
विचार कीजिए | वृद्धों ने कहा भी है-चलते, बैठते अथवा जागते, सोते जिसका मन विचारमग्न नहीं
रहता वह मृतक कहलाता है| तृष्णारूपी मछली जिसमें फँसी है, मोहरूपी सेवार से जो मेला हुआ है,
संसाररूपी जल में फैला है एवं जो चिन्तारूप तन्तुओं से निर्मित है, ऐसे वासनाजाल को जैसे आकाश
में बह रही तेज आँधी से बादल छिन्न-भिन्न हो जाता है वैसे ही मेरे द्वारा उपदिष्ट इस तीखी बुद्धिरूपी
कैंची से काटिये जो अत्यन्त विस्तीर्ण ब्रह्म की ओर उन्मुख है