Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 28–30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verses 28–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
निराशता निर्भयता नित्यता समता ज्ञता ।
निरीहता निष्क्रियता सौम्यता निर्विकल्पता ॥ २८ ॥
धृतिर्मैत्री मतिस्तुष्टिर्मृदुता मृदुभाषिता ।
हेयोपादेयनिर्मुक्ते ज्ञे तिष्ठन्त्यपवासनम् ॥ २९ ॥
धावमानमधोभागे चित्तं प्रत्याहरेद्बलात् ।
प्रत्याहारेण पतितमधो वारीव सेतुना ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
अब जीवन्मुक्त पुरुष के लक्षणभूत पन्द्रह गुणों को कहते हैं।
निराशता, निर्भयता, नित्यता, समता, ज्ञाता, निरीहता, निष्क्रियता, सौम्यता, निर्विकल्पता,
धैर्य, मेत्री, सन्तोष, मधुरता, मधु-भाषिता ओर मननशीलता ये हेय ओर उपादेय से रहित ज्ञानी मे,
वासना के बीज अज्ञान के नष्ट होने के कारण, वासनारहित रहते है