Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
यथा शर्वोऽपि लिङ्गानि न बिभर्ति बिभर्ति च ।
त्वमेवमिह कार्याणि कुरु मा कुरु चानघ ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे महेश्वर पृथ्वी आदि अष्टमूर्तिरूप
लिंगों को शुद्ध चिन्मात्रदृष्टि से नहीं धारण करते और जगदाकार में विवर्तित माया के अधिष्ठान होने से
अपने संनिधानमात्र से उन्हें धारण भी करते हैं उससे सर्वकर्ता भी होते हे वैसे ही आप भी राज्य आदि
कार्यो को अन्यथा से केवल संनिधि-मात्र से कीजिये ओर आत्मा अकर्ता है, इस निश्चय से न भी
कीजिये