Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
त्वमेव वेत्ता त्वमजस्त्वमात्मा त्वं महेश्वरः ।
आत्मनोऽव्यतिरिक्तः संस्त्वयेत्थमिदमाततम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
नान्योऽतोऽरित द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता । (इससे अन्य द्रष्टा नहीं है, इससे अन्य
श्रोता नहीं है ।) इत्यादि श्रुति सब शरीरो मेँ आप ही अप्रच्युत स्वभाव हैं, परमार्थ सत् हैं, आप ही
जन्मादिविकार शून्य अज हे, आप ही सबकी आत्मा हैं एवं आप ही पूर्वोक्त महेश्वर हैं । इस प्रकार के
आपने अपने अज्ञान से इस प्रकार इस प्रपंच का विस्तार किया है, दूसरे ने नहीं किया है