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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 71

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 71

संस्कृत श्लोक

यदेतत्स्पन्दितं नाम तन्मनोऽधिगतं शठैः । मरुतां विद्धि तां शक्तिमन्तः प्राणशरीरिणीम् ॥ ७१ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्‌ की परिच्छिन्न स्यन्दकल्पना ही मन है, ऐसा पहले कहा गया है, अब चित्‌ ओर अचित्‌ अंश का विवेक होने पर चिदांश के आत्मात्र होने से जडांश स्पन्दकल्पना ही अवशिष्ट रहती है, इस प्रकार की स्यन्दशक्ति तो प्राण ही है, उसका निरोध करने पर मन नामक अन्य कोई निरोधयोग्य नहीं है, ऐसा कहने के लिए भूमिका बोधते हैं। जो यह स्पन्दित है, उसी को स्वयं अपनी वंचना करनेवाले अज्ञानियों ने मन जाना, उसे आप अन्नमयकोश के अन्दर स्थित प्राणमय कोशरूप वायुओं की शक्ति जानिये