Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 70
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
यथातपे क्षते स्फारे मृगतृष्णातरङ्गिणी ।
कलना तद्वदेवेयं स्फुरत्यात्मनि सत्यलम् ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
नित्यचिदात्मा का यदि स्वीकार न किया जाय, तो कलना आदि के अध्यास की सिद्धि ही नहीं
होगी, ऐसा कहते है।
जैसे तेज धूप के तपने पर मृगतृष्णानदी स्फुरित होती हे वैसे ही आत्मा के रहने पर ही यह कलना
खूब स्फुरित होती हे