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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

प्राणानां स्पन्दनी शक्तिर्ज्ञानशक्तिः परात्मनः । इन्द्रियाणां निजा शक्तिरेकः कोऽत्र निबध्यते ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे सव शक्तियों से बँधा हुआ मन क्यो नहीं माना जाता ? तो इस पर यह उक्ति विवेक करने पर संगत नहीं होती, क्योकि वीणा की मधु ध्वनि के समान शक्तियो के समुदाय से ही समुदित व्यवहार की सिद्धि हो सकती है, इस आशय से कहते हैँ । प्राणों की स्पन्दन शक्ति है, परमात्मा की ज्ञानशक्ति है ओर इन्द्रियो की पृथक्‌ पृथक्‌ अपनी शक्त्यो हैं भला उनसे यहाँ एक कौन बोधा जाता है ? भाव यह है कि जैसे किसी समाज में स्नान, दान, गान, स्तुति, आदि नाना व्यवहार किसी एक सर्वशक्तिमान पुरुष से सम्पन्न नहीं होता, उसी तरह यहाँ भी सब व्यवहार एक-से ही नहीं हो सकता