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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

सर्वास्तदंशवस्तस्य सर्वशक्तेः किलात्मनः । पृथक्ता वाच्यता चेयं कुतो नाम तवोत्थिता ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि समुदाय किसी समुदायकर्ता अन्य के लिए ही होता है, ऐसा नियम है, अतः यहाँ पर भी कोई संघातकर्ता अपेक्षित है ? तो इस संघात के भी जगद्रूप संघात के मध्यवर्ती होने के कारण सबकी सव व्यवहार शक्तिर्या सबके निमणि- कर्ता आत्मरूप परमेश्वर की ही किरण रूप हैं। अत: यह संघात भी उन्हीं के लिए सिद्ध होगा, अचेतन मन के लिए नही, इसलिए प्रतिशरीर भिन्न वेतन मन की सिद्धि नहीं हुई, इस आशय से कहते है। ये सब व्यवहारशक्तियाँ सर्वशक्तिमान परमात्मा की ही किरणे है । मन आदिशब्द वाच्यता एवं पृथक्ता आपकी कहाँ से उदित हुई ?