Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
किं नाम जीव इत्युक्तं येनेहान्धीकृतं जगत् ।
चित्तं चैवासदेव त्वं विद्धि का तस्य शक्तता ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अच्छा, चेतन जीव इसका अधिष्ठाता हो, वह चित्तरूप लगाम के बिना इन्द्रियरूपी घोड़ों को काबू
में रखने के लिए समर्थ नहीं हो सकता, इसलिए चित्त भी सिद्ध हो ही गया, ऐसा यदि कोई कहे, तो उस
पर कहते है।
जीवरूप से जो कहा गया है, उसको और जिसने इस जगत को अन्ध बना डाला हे उस चित्त को
भी आप असत् ही जानिये, उसकी कौन शक्ति है ? भाव यह है कि 'जीवति' और "चित्तमेव च “यो आपने
जो दो कहे हैं, वे क्या है, क्या आत्मा से भिन्न कोई अन्य चेतन हैं या अचेतन हैँ ? प्रथम पक्ष तो बन नहीं
सकता, क्योकि “ नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता इस श्रुति से ब्रह्म से अतिरिक्त अन्य
चेतन का निषेध है। दूसरे पक्ष मे अचेतन को चेतन पदार्थ की आवश्यकता होने से इन्द्रियों से उसमें कोई
अन्तर नहीं रहा, अतः इन्द्रिय अधिष्ठानशक्ति उसमें नहीं हो सकती है । इस सब हेतुओं से आप उन
दोनों को असत् ही जानिये