Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 21–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verses 21–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 21-31
संस्कृत श्लोक
लिक्षामणुकणक्षामां क्षुधा खादति मक्षिका ।
तां कोशकारः क्षुधितो दंशस्तमपि चञ्चलम् ॥ २१ ॥
तं दंशं दर्दुरो भुङ्क्ते व्यालस्तमपि दर्दुरम् ।
सर्पमुग्रं खगो हन्ति बभ्रुश्चैनं निकृन्तति ॥ २२ ॥
बभ्रुं हिनस्ति मार्जारो मार्जारं श्वा निकृन्तति ।
ऋक्षः कौलेयकं हन्ति ऋक्षं व्याघ्रो निकृन्तति ॥ २३ ॥
सिंहोऽभिभवति व्याघ्रं शरभः सिंहमत्ति च ।
शरभो नाशमायाति मत्तमेघविलङ्घने ॥ २४ ॥
मेघा वातैर्विधूयन्ते वायवो गिरिभिर्जिताः ।
गिरयो वज्रनिष्पिष्टाः शक्रस्य वशगः पविः ॥ २५ ॥
विष्णुना क्रियते शक्रो विष्णुर्गच्छति जन्तुताम् ।
सुखदुःखदशामेतां जरामरणपालिताम् ॥ २६ ॥
जन्तवोऽपि महाकाया अपि विद्यायुधान्विताः ।
लिक्षाभिरङ्गलग्नाभिरुपजीव्यन्त एव हि ॥ २७ ॥
अजस्रमेवमालूनविशीर्णं भूतजङ्गलम् ।
परस्परमलं मोहादद्यते रक्ष्यतेऽपि च ॥ २८ ॥
अनारतं विनश्यन्ति विविधा भूतजातयः ।
अनारतं च जायन्ते लिक्षायूकापिपीलिकाः ॥ २९ ॥
जलकोशेषु जायन्ते मत्स्येभमकरादयः ।
भूमावन्तः प्रजायन्ते कीटौघा वृश्चिकादयः ॥ ३० ॥
अन्तरिक्षेऽपि जायन्ते आकाशविहगादयः ।
वनवीथिषु जायन्ते सिंहव्याघ्रमृगादयः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
अब बलवानों द्वारा दुर्बलो के पीडन का परम्परा द्वारा उपपादन करते हैं।
भूखी मक्खी परमाणु कण के समान सूक्ष्म लीख को खाती है, उसको भूखी मकड़ी खा जाती है,
चंचल मकड़ी को भी जंगली डाँस खा डालता है, उस डस को मेढक खा डालता है। मेढक को भी साँप
निगल जाता है, भयंकर साँप को गरुड़ मार डालता है और नेवला काट डालता है, नेवले को बिलाव
मार डालता है और बिलाव को कुत्ता काट डालता है, कुत्ते को भालू मार डालता है, भालू को बाघ मार
डालता है, बाघ के ऊपर सिंह आक्रमण करता है और शरभ नाम का मृग सिंह को खा डालता है, गरज
रहे मेघ के अपने ऊपर चलने पर उसको सहन न करने से उछलकर पत्थरों की चट्टानों पर गिरने के
कारण मेघ द्वारा शरभ नाश को प्राप्त होता है, मेघ वायुओं से उड़ाये जाते हैं, वायु पर्वतों से जीते जाते
हैं। पर्वत व्र से चूर-चूर किये गये हैं, वज भी इन्द्र का वशीभूत है, इन्द्र को विष्णु बनाते हैं, विष्णु भी
सुख-दुःख दशाओं से भरी हुई, जरा-मरण से अपने भोज्य अन्न के समान पालित जन्तुता को प्राप्त
होते हैं और जन्तु भी, जो महाकाय है ओर विद्या तथा आयुधो से युक्त है, तथापि लीख, मच्छर,
खटमल, मक्खी आदि शरीर में लगे हुए जीवों से खाये ही जाते हैँ । इस प्रकार आधिभोतिक दुःखों से
चारों ओर छिन्न-भिन्न, आध्यात्मिक ओर आधिदैविक दुःखों से जर्जरित जीव व्यर्थ मोहवश परस्पर
खाया जाता है और आगे खाने के लिए कुछ अंश में रक्षित भी होता है । विविध भूतो की जातियाँ
निरन्तर नष्ट होती हैं और निरन्तर लीखें, जुएँ, चीटिर्यो आदि बहुत से जीव उत्पन्न होते हैँ । जल में
मछली, जलहाथी, मगर आदि जीव पैदा होते है, भूमि के अन्दर बिच्छू आदि कीड़ों के समूह उत्पन्न
होते हैं, आकाश में भी आकाश पक्षी (& ) आदि उत्पन्न होते हैं एवं वन पंक्तियों में सिंह, व्याघ्र, मृग
आदि पैदा होते हैँ