Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 32–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verses 32–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 32,33
संस्कृत श्लोक
प्राण्यङ्गेष्वपि जायन्ते विचित्राः ककुभं प्रति ।
स्थावरेष्वपि जायन्ते घुणा जघनकादयः ॥ ३२ ॥
शिलान्तरेषु जायन्ते कीटभेकघुणादयः ।
विष्ठायामपि जायन्ते नानाकीटगणास्तथा ॥ ३३ ॥
एवमेतेष्वसंख्येषु जन्मस्वपचयेषु च ।
अजस्रं करुणावन्तो नन्दन्तु प्ररुदन्तु वा ॥ ३४ ॥
अनारतमृतावस्मिन्ननारतसमुद्भवे ।
संसारसंभ्रमे युक्ता न तुष्टिर्न च दुःखिता ॥ ३५ ॥
पङ्क्तयस्त्वेवमेवेमा वृक्षपर्णगणैः समाः ।
उत्पत्योत्पत्य लीयन्ते भूतानां भूरिसंभवाः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रत्येक दिशा में प्राणियों के शरीरो में भी कीड़े, जुएँ आदि विचित्र जीव
पैदा होते हैं, वृक्ष आदि स्थावर जीवों मे धुन, भ्रमरी के आकार के अन्य काष्ठ जीव आदि उत्पन्न होते
हैं, शिलाओं के अन्दर भी कीड़े, मेढक, घुन आदि जीव उत्पन्न होते हैं और विष्ठा में भी भाँति-भाँति
के कीड़े उत्पन्न होते हैं