Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 39–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verses 39–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 39-41
संस्कृत श्लोक
किं किल स्फारमनसां पशूनां च विशेषणम् ।
कृष्यन्ते पशवो रज्ज्वा मनसा मूढचेतसः ॥ ३९ ॥
स्वचित्तपङ्कमग्नानां स्वनाशारब्धकर्मणाम् ।
मूर्खाणामापदं दृष्ट्वा प्ररुदन्त्युपला अपि ॥ ४० ॥
अनिर्जितात्मचित्तानां समन्ताद्दुःखदा दशाः ।
तन्मार्जनं कृतप्रज्ञो नाऽतः संप्रतिपद्यते ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जिन्होंने अपने मन को विषयों में फैला
रक्खा है, उन मनुष्यों और पशुओं में क्या अंतर है ? पशु रस्सी से खींचे जाते हैं और मूढ़चित्तवाले
(&) आकाश पक्षी : एक प्रकार के छोटे-छोटे पक्षी वे सदा आकाश में ही घूमते हुए ही बच्चे
देते हैं | उत्पन्न हुए अण्डे को नीचे गिरने के पहले ही तोड़कर निकले हुए बच्चे तुरन्त पंखवाले हो
जाते हैं और वे भी आकाश में ही उड़कर घूमते हैं, यह लोक प्रसिद्ध है ।
पुरुष मन से खीचे जाते हें । अपने चित्तरूपी कीचड़ में फँसे हुए और अपने नाश के लिए कर्म का आरम्भ
करनेवाले मूर्खो की आपत्तियों को देखकर पत्थर भी रोते हैं चेतनों की तो बात ही क्या है ? जिन लोगों
ने अपने चित्त पर विजय प्राप्त नहीं की, उनकी सब देशों मेँ सदा दुःख देनेवाली दशाएँ भरी हुई हैं,
इसलिए बुद्धिमान पुरुष उनके मार्जन में प्रवृत्त नहीं होता, क्योकि उनका मार्जन समस्त भूमि की धूलि
के माजर्न के समान असम्भव है