Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
यावद्विस्मृतवानात्मतत्त्वं मूढो भवद्भवान् ।
तावत्तव मनोव्यालो बभूवाभ्युदितस्ततः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रसंग प्राप्त अधिकारी विचार को समाप्त कर प्रस्तुत विषय का ही अनुसरण करते हुए कहते है ।
हे महाबाहो, मन नहीं है, वृथा आप उसकी कल्पना न कीजिये । जैसे कल्पित वेताल से बालक
मारा जाता हे वैसे ही कल्पित मन से आप मारे जाते है ॥४ ३॥
यदि मन नहीं है, तो प्रतियोगी की असिद्धि होने से उसके निषेध का अवसर ही नहीं है । ऐसी यदि
कोई शंका करे तो इस पर कहते है ।
जब तक आत्मतत्त्व को भूले हुए आप मूढ हुए थे, तभी तक आपका मनरूप सर्प उदित हुआ
था