Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
इदानीं भवता ज्ञातं यथाभूतमरिंदम ।
संकल्पाद्वर्धते चित्तं तदेवाशु परित्यज ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे शत्रुनाशन, इस समय आप परमार्थ आत्मरूप को जान चुके हैँ । संकल्प से चित्त की
अभिवृद्धि होती है; इसलिए आप संकल्प का ही शीघ्र परित्याग कीजिये