Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
अयं गुणसमाहारो बन्धायैव समाश्रितः ।
संत्यक्तो भव मोक्षाय यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई प्रश्न करे, यह दृश्यतत्त्व क्या है, तो इस पर कहते हैं।
इस त्रिगुणात्मक मायामय प्रपंच का आश्रय बन्धन के लिए ही है । यदि इसका त्याग किया जाय तो
संसार के मोक्ष के लिए होता हे । बन्धन और त्याग के विषय मेँ जैसी आपकी अभिरुचि हो, वैसा
कीजिये