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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 48–49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verses 48–49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 48,49

संस्कृत श्लोक

नाहं नेदमिति ध्यायंस्तिष्ठ त्वमचलाचलः । अनन्ताकाशसंकाशहृदयो हृदयेश्वरः ॥ ४८ ॥ आत्मनो जगतश्चास्य त्वमङ्ग कलनामलम् । राम द्वित्वमयीं त्यक्त्वाशेषस्थः सुस्थिरो भव ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

“अहम्‌ यानी आन्तरदृश्य ओर “इदम्‌ यानी बाह्य दृश्य है ही नहीं, इस प्रकार ध्यान कर रहे, अनन्त आकाश के तुल्य विशाल हृदयवाले, आत्मरूप आप पर्वत के समान निश्चल हो स्थित होइये । हे श्रीरामचन्द्रजी, आप आत्मा की ओर इस जगत की “मेँ ओर "यह! इस प्रकार की भेदमयी कलना का सर्वथा परित्याग कर ब्रह्मनिष्ठ हो स्थिर होईये