Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
आत्मनो जगतश्चान्तर्द्रष्टृदृश्यदशान्तरे ।
दर्शनाख्ये स्वमात्मानं सर्वदा भावयन्भव ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे, उन दोनो का कलना का त्याग करने पर कौन वस्तु अवशिष्ट रहती है, जिसमें आप
स्थिति का उपदेश देते हैं, तो इस पर कहते है।
द्रष्टा और दृश्य दशाओं के मध्य में एवं आत्मा ओर जगत के मध्य में यानी त्रिपुटी में अनुस्यूत,
सन्मात्ररूप, दर्शननामक त्रिपुटी के साक्षी स्वभाव में स्थित अपने स्वरूप की सर्वदा भावना
कीजिये