Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 52–56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verses 52–56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 52-56
संस्कृत श्लोक
रामानुभवनीयस्य तथानुभवितुः स्वयम् ।
अवलम्ब्य निरालम्बं मध्यं मध्ये स्थिरो भव ॥ ५२ ॥
भवभावनया हीनं भावाभावदशोज्झितम् ।
भावयन्नेवमात्मानमात्मसंस्थः स्वयं भव ॥ ५३ ॥
आत्मसत्तां त्यजन्नेतां चेत्यं भावयसि स्वयम् ।
यदा राम तदा यासि चित्ततामतिदुःखदाम् ॥ ५४ ॥
चित्ततां शृङ्खलामेतां स्वरूपज्ञानयुक्तितः ।
बिलाच्चित्तान्महाबाहो स्वात्मसिंहं विमोचय ॥ ५५ ॥
परमात्मदशां त्यक्त्वा चेत्यं परिपतन्नलम् ।
यदा गच्छसि संकल्पं चेत्यं संपश्यसे तदा ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
अनुमति आदि अन्य अनुभवों में भी ऐसा ही समझना चाहिये, इस आशय से कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, अनुभव करने योग्य और अनुभव-कर्ता के विषयभूत त्रिपुटी अंश से व्यतिरिक्त
मध्य का (उसके साक्षी का) अपने हृदय में अवलम्बन करके आप स्वयं स्थित होइये । भव की भावना
यानी संस्कारवश संसार के दर्शन (स्वप्नदशा से) शून्य, भावदशा (जाग्रत्दशा) और अभावदशा
(सुषुप्ति) से रहित आत्मा का इस प्रकार भाव कर रहे आप स्वयं आत्मनिष्ठ होइये। हे श्रीरामचन्द्रजी,
शुद्ध चिन्मात्र स्वभाववाली आत्मसत्ता का प्रमादवश त्याग कर रहे आप जो स्वयं चेत्य की भावना करते
हैं, तब आप अतिदुःख देनेवाली चित्तता को प्राप्त होते हैं। हे महाबाहो, इस चित्तरूपी कड़ी को स्वरूपज्ञान
युक्ति से तोड़कर चित्तरूप पिंजडे से आत्मारूपी सिंह को मुक्त कीजिये। जब आप परमात्मदशा का त्याग
कर तेजी से चेत्य की ओर गिरते हुए संकल्प को प्राप्त होते हैं, तब चेत्य को देखते हैं