Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 57–58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verses 57–58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
आत्मनो व्यतिरिक्तं सच्चित्तमित्यङ्ग संविदा ।
मनः संपद्यते दुःखि क्षीयते त्यक्तया तया ॥ ५७ ॥
आत्मैवेदं जगत्सर्वमित्यन्तः संविदोदये ।
क्व चेता क्वच वा चित्तं किं चेत्यं चेतनं च किम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे चेत्य की ओर जीव गिरता है, उससे कैसे संकल्पो को प्राप्त होता है और कैसे संकल्प का क्षय
होता है, ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर यह कहते हैं।
जब चित्त-पूर्व अनुभव से उत्पन्न दृश्य संसार के उद्बुद्ध होने पर चित्त ही कुछ स्थूलता को प्राप्त
चित् है, इस ज्ञान से आत्मा से व्यतिरिक्त सिद्ध होता है तब पुनःपुनः मनन से दृश्य संकल्प करने में
समर्थ हो मन होता है और वही दुःखी है। अपने से अतिरिक्त मन है, इस संवित् के त्याग से तो वह नष्ट
हो जाता है