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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verses 11–12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 15, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

न स्थिता कोटरे यस्य तृष्णाकृष्णभुजङ्गमो । तस्य प्राणानिलाः स्वस्थाः पुंसो हृदयरन्ध्रगाः ॥ ११ ॥ नूनमस्तंगतो यत्र तृष्णाकृष्णनिशाक्रमः । पुण्यानि तत्र वर्धन्ते शुक्लपक्ष इवेन्दवः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

तृष्णा का नाश होने पर सब दुःख निवृत्त हो जाते है, सव पुण्यों का उदय होता है, ऐसा कहते हैं। जिस वृक्षरूपी पुरुष के खोखलेरूपी हृदय में काली साँपिनरूपी तृष्णा बैठी नहीं है, उस पुरुष के हृदयरन्ध्र में चलनेवाले प्राणवायु स्वस्थ रहते हैं । इसमें सन्देह नहीं कि जिस पुरुष में तृष्णारूपी अँधेरी रात अस्त हो गई, उसमें शुक्लपक्ष में चन्द्रमा के समान पुण्य बढ़ते हैं