Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 15, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
यो न तृष्णाघुणावल्ल्या क्षतः पुरुषपादपः ।
पुण्यप्रसूनैः स सदा दशां याति विकासिनीम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
जो
पुरुषरूपी वृक्ष तृष्णारूपी घुनों से घुन नहीं गया, वह सदा पुण्यरूपी फूलों से प्रफुल्लित दशा को
प्राप्त होता है