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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 15, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

कयाचिदेव दैविक्या हृदि ग्रथितयानया । तृष्णया भ्राम्यते व्योम्नि रज्ज्वेवार्कोऽन्वहं किल ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

ईश्वर से प्रयुक्त या देवभोग्य सुखलेश विषयिणी रज्जु की तरह हृदय में गुँथी हुई इस अलोकिक तृष्णा से ही प्रतिदिन सूर्य आकाश में घुमाए जाते हैं