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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 16, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 16, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

सुषुप्तवत्प्रशमितभाववृत्तिना स्थितं सदा जाग्रति येन चेतसा । कलान्वितो विधुरिव यः सदा मुदा निषेव्यते मुक्त इतीह स स्मृतः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

जो पुरुष जिसकी पदार्थो मे आस्था शान्त हो गई, ऐसे चित्त से युक्त होकर, जाग्रत में भी सदा सुषुप्त की तरह स्थित रहता है ओर जैसे पूर्ण चन्द्रमा स्वाभाविक प्रसन्नता से सेवित होते है वैसे ही जो स्वाभाविक हर्ष से सेवित होता है, वह इस लोक में मुक्त कहा जाता हे