Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 16, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 16, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सर्वत्र वासनात्यागो राम राजीवलोचन ।
द्विविधः कथ्यते तज्ज्ञैर्ज्ञेयो ध्येयश्च मानद ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्टजी ने कहा : हे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी, विद्वानों द्वारा ज्ञेय ओर ध्येय भेद से दो प्रकार
का वासना त्याग सर्वत्र कहा जाता है । ज्ञेय यानी विद्वानों से समाधिकाल में या विदेहमुक्ति में ज्ञान से
बाधित । ध्येय यानी अधिष्ठानमात्र परिशेषरूप । व्युत्थानकाल में वाक्यजन्य अखण्डाकार वृत्ति से
वासनासहित अज्ञान का वाध होने पर भी जीवन्मुक्ति प्रतिपादक शास्त्र के अनुरोध से ओर प्रारब्ध फल
भोग के शेष रहने से उन दोनों के निर्वाह के लिए बाधित अनुवृत्तिवाले अविद्यालेश के शेष का या
विक्षेपांश के अबाध का स्वीकार करना पडता है एवं जिसमें अहंभाव का अध्यास नहीं, ऐसी देह से
भोगहेतु व्यवहार की सिद्धि न होने से उसमें तात्कालिक अहंकारभासकी अनुवृत्ति विद्वानों के अनुभव
से सिद्ध है, अतः व्युत्थानदशा में अहंकारबाध के अनुसन्धान प्रयत्न साध्य होने के कारण प्रायः ध्यानरूप
है, इसलिए उक्त वासना त्याग ध्येय के समान होने के कारण ध्येय हे ।
उन दोनों में दूसरे पक्ष का उपपादन करते हैं।
विवेकियों की दृष्टि से दो अहंप्रतीति गोचर प्रतीत होते हैं एक देह, इन्द्रिय, बुद्धि ओर मन की
अपेक्षा करनेवाला ओर मित्र, पुत्र, स्त्री, धन आदि की ममतावाला संघातात्मा ओर दूसरा
अखण्डेकस्वभाव, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं ओर मरण, मूर्छा, जन्मान्तर का साक्षी,
विवेक करने पर अवशिष्ट चिन्मात्र स्वभाववाला