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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 16, Verses 7–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 16, verses 7–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 7-9

संस्कृत श्लोक

अहमेषां पदार्थानामेते च मम जीवितम् । नाहमेभिर्विना कश्चिन्न मयैते विना किल ॥ ७ ॥ इत्यन्तर्निश्चयं कृत्वा विचार्य मनसा सह । नाहं पदार्थस्य न मे पदार्थ इति भाविते ॥ ८ ॥ अन्तःशीतलया बुद्ध्या कुर्वत्या लीलया क्रियाम् । यो नूनं वासनात्यागो ध्येयो राम स कीर्तितः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

उनमें प्रथम के स्वरूप का पहले विचार कर निश्चय करना चाहिये, ऐसा कहते है। इस देह, इन्द्रिय आदि पदार्थो ओर उपभुक्त बाहरी अन्न, पान आदि पदार्थो का मैं संघात्मा हूँ, मेरे ये जीवित हैं यानी मेरे स्वरूप सिद्धि में निमित्तभूत है । अतएव इनके बिना मैं व्यवहार में कुछ भी नहीं हूँ ओर मेरे बिना ये कुछ नहीं है, ऐसा अन्तःकरण मे प्रथम अहंपदार्थ का निश्चय करके मन के साथ उसके पृथक्‌ करने पर संघातात्मा को अत्यन्त असद्रूप ही जानकर दूसरी अखण्डैकरस आत्मा की चिद्रूप से मैं पदार्थ का संघातात्मा नहीं हूँ और ये पदार्थ मेरे जीवित नहीं हैं, ऐसे ज्ञान से तद्रूप भावना करने पर लीला से कार्य कर रही अन्तः शीतल बुद्धि से जो भावनारूप वासनात्याग है, उसे हे श्रीरामचन्द्रजी मैंने ध्येय वासना त्याग कहा है