Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 17, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
बाह्यार्थव्यसनोच्छूना तृष्णा बद्धेति राघव ।
सर्वार्थव्यसनोन्मुक्ता तृष्णा मुक्तेति कथ्यते ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, बाह्य विषयों में जो लम्पटता से बढ़ी-चढ़ी तृष्णा है वह बद्ध कहलाती है। सम्पूर्ण
पदार्थों में जो लम्पटता से रहित जो तृष्णा है वह मुक्त कहलाती है