Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 17, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

नूनमुज्झितसंकल्पा हृदि बाह्ये विहारिणी । वासना योदिता सेह जीवन्मुक्तशरीरिणी ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

भोग्य पदार्थों में “ये मिथ्या है" इस निश्चय से हृदय मेँ भोगसंकल्परहित और एकमात्र लोक संग्रह के लिए बाह्य पदार्थो मेँ विहार करनेवाली जो तृष्णा उदित होती है, वह जीवन्मुक्तो के ही शरीर में आश्रित है