Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 13–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 18, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 13-15
संस्कृत श्लोक
वयं तु वक्तुं मूर्खाणामजितात्मीयचेतसाम् ।
भोगकर्दममग्नानां न विद्मोऽभिमतं मतम् ॥ १३ ॥
तेषामभिमता नार्यो भावाभावविभूषिताः ।
ज्वालानरकवह्नीनां यास्ताः कनकरोचिषः ॥ १४ ॥
अनर्थगहनाश्चार्था व्यर्थानर्थकदर्थनाः ।
दिशन्तो दुःखसंरम्भमभितः प्रहितापदः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
मुक्तो की स्थिति के समान बद्ध पुरुषों की स्थिति का उनके आशय के उद्धरण द्वारा आप वर्णन
कीजिये, ऐसा यदि श्रीरामचन्द्रजी कहें, तो मूर्खो की मनोरथयुक्त भ्रान्त्यो उनसे प्रयुक्त दुश्वेष्टाएँ
तथा उनके फलभूत दुःखो की विचित्रताएँ अनन्त है, अतएव उनका वर्णन नहीं किया जा सकता, इस
आशय से कहते है।
जिन्होंने अपने चित्त पर विजय प्राप्त नहीं की एवं जो भोगरूप कीचड़ में डूबे हैं, ऐसे मूर्खो के
अभिमत को कहने के लिए हमें परिज्ञान नहीं है। उन मूर्खो को नारियाँ, जो विवेक-बुद्धियों के अत्यन्ताभाव
से, पूर्वसंचित पुण्यों के प्रध्वंसाभाव से ओर सम्भावित पुण्य, तप, संयम आदि के प्रागभाव के परिपालन
से पैर से लेकर मस्तक तक अलंकृत है अतएव जो सुवर्णं की कान्ति के समान कान्तिवाली नरकाग्नियों
की ज्वाला हैँ, अभिमत हैं ओर अनर्थो से भरे हुए यानी उपार्जन, रक्षण, व्यय ओर नाश में बहुत आयास
एवं अधर्म के निमित्तभूत, व्यर्थ अनर्थ प्रयोजक कलह, वैर आदि क्लेशो के कारण, संसारदुःख को
देनेवाले तथा चारों ओर से आपत्तियों की वर्षा करनेवाले घन ईच्छित हे