Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 18, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
फलसंधीनि कर्माणि नानाचारमयानि च ।
सुखदुःखावपूर्णानि तानि वक्तुं न शक्नुमः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे, इस प्रकार के धन से भी यज्ञादि सत्कर्म का आचरण होने से उनका निस्तार हो
सकता है, तो इस पर नही", ऐसा कहते है ।
मूर्खो के जो यज्ञादि कर्म हैँ, वे भी फलाभिलाषा युक्त ही हैं ओर विविध प्रकार के दंभ, मान, मद,
मात्सर्य आदि दुराचारो से पूर्ण है अतएव पुनर्जन्म आदि से होनेवाले सुख-दुःखों से भरे हुए हैं, इसलिए
मूर्खो का कुछ भी निस्तार का हेतु हम नहीं कह सकते