Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 42–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 18, verses 42–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 42,43
संस्कृत श्लोक
मा गच्छ दुःखितां राम सुखितामपि मा व्रज ।
समतामेहि सर्वत्र परमात्मा हि सर्वगः ॥ ४२ ॥
अनन्तः सत्स्वरूपस्त्वं खमिवातिततान्तरम् ।
प्रकाशो नित्यशुद्धस्त्वं ज्वालानामिव कोटरम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
जबकि आत्मा के जन्म आदि का संगी होने पर भी शोक युक्त नहीं है, तब फिर असंग, उदासीन,
नित्य, कूटस्थ, स्वप्रकाश, पूर्ण, आनन्दैकरस आत्मा मे शोक उचित नहीं, इसमें कहना ही क्या, इस
आशय से उपसंहार करते है ।
इसलिए मायिक जगत के क्रम में दुःखी होना उचित नहीं है; किन्तु स्वाभाविक सन्तोषवृत्ति ही उचित
है तथा स्वाभाविक कार्यो का अनुवर्तन उचित है ॥ ४ १॥ हे श्रीरामचन्द्रजी, आप दुःखी न होइये ओर सुखी
भी न होइये। सब जगह आप समता को प्राप्त होइये; क्योकि परमात्मा सर्वव्यापक हे । अनन्त, सत्स्वरूप
आप व्यापक आकाश के समान हैं तथा ज्वाला ओं के चारों ओर से प्रभा से व्याप्त मध्यभाग में अन्धकार
का अवकाश नहीं है, वैसे ही आप में भी अज्ञान दुःख आदि का अवसर नहीं है, यह भाव हे