Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 44–47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 18, verses 44–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 44-47
संस्कृत श्लोक
जागतानां पदार्थानामदृष्टात्मतनुस्तनुः ।
हृत्स्थोऽसि हारमुक्तानामेकस्तन्तुरिवाततः ॥ ४४ ॥
संसारस्थितिरेवेयं यद्भूत्वा भूयते पुनः ।
अज्ञेनैव न तज्ज्ञेन ज्ञोऽसि राम सुखी भव ॥ ४५ ॥
स्वरूपमिदमस्यास्तु संसृतेः सतताधिमत् ।
अज्ञानात्स्फारतामेति ज्ञातवानसि सन्मते ॥ ४६ ॥
रूपं किमन्यद्भवतु भ्रममात्रादृते भ्रमे ।
स्वप्नमात्रादृते स्वप्ने भवत्यन्यो हि कः क्रमः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
आप ही सवके अन्तरात्मा है, ऐसा कहते है।
जिनका स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं हुआ, ऐसे सूक्ष्म आप हारभूत मोतियों के एक दीर्घ तन्तु के समान
सब जगत के पदार्थों के अन्दर स्थित हे । यह संसार की स्थिति ही हे कि अज्ञ को ही उत्पन्न होकर फिर
उत्पन्न होना पडता है, ज्ञानी को नहीं । हे श्रीरामचन्द्रजी आप ज्ञानी है, आप सुखी होइये । हे
श्रीरामचन्द्रजी, इस संसार का यह स्वरूप दुःखों से पूर्ण है, अज्ञान से ही यह विस्तार को प्राप्त होता है ।
हे सन्मते, आप ज्ञानवान हैँ । भ्रम में एकमात्र भ्रम के सिवाय ओर दूसरा रूप क्या हो सकता है ? स्वप्न
में एकमात्र स्वप्न को छोडकर अन्य कोन क्रम हो सकता है ? भाव यह है कि अन्य भ्रान्तियों मे वास्तविकता
की प्रसिद्धि न होने के कारण इसमें भी कोई वास्तविकता नहीं हे