Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 59–61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 18, verses 59–61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 59-61
संस्कृत श्लोक
संसारसरणावस्यां तथा विहर सुव्रत ।
न यथैव श्रमश्रान्तो वासनाभारवानिव ॥ ५९ ॥
यथा यथैषा कार्याणि वासनाक्षयकारिणी ।
विचारणा तवोदेति संशाम्यन्ति तथा तथा ॥ ६० ॥
अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु विगतावरणैव धीः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे सुव्रत श्रीरामचन्द्रजी, वासनाभारवान की यानी अज्ञानी की तरह
जैसे आप श्रम से परिश्रान्त न हों, वैसे इस संसार मार्ग में आप विहार कीजिये । वासनाओं का क्षय
करनेवाली यह विचारणा जैसे-जैसे आपमें उदित होती है वैसे-वैसे व्यवहार बन्द होते जाते हैँ । यह
बन्धु है, यह बन्धु नहीं है, ऐसी गणना संकुचित चित्तवाले पुरुषों में होती है, उदाराशय पुरुषों की तो
बुद्धि आवरणशून्य (यही बन्धु है, इस प्रकार के परिच्छिन्नतारूप आवरण से रहित) यानी सर्वत्र
समदर्शिनी हे