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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, Verses 10–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 19, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

तस्यास्त्रिपथगायास्तु तीरे विकसितद्रुमे । रत्नाद्रितटविद्योते कचत्कनकपिञ्जरे ॥ १० ॥ आसीदभ्युदितज्ञानस्तपोराशिरुदारधीः । मुनिर्दीर्घतपा नाम तपो मूर्तमिवापरम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

उस आकाशगंगा के दैदीप्यमान, सुवर्ण-से पीले तट पर, जहाँ फूले हुए वृक्ष थे और रत्नमयपर्वत के तट से प्रकाश जगमगाता था वहाँ ज्ञानवान्‌, तपस्या की राशिरूप, उदारबुद्धि दीर्घतपा नामक मुनि निवास करते थे, जो मूर्तिमान दूसरे तपरूप थे