Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, Verses 2–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 2, verses 2–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 2-8

संस्कृत श्लोक

वसिष्ठो राघवश्चैव राजानो मुनयो द्विजाः । इति चक्रुः स्वकार्याणि तथा स्वगृहवीथिषु ॥ २ ॥ सस्नुः कमलकह्लारकुमुदोत्पलहारिषु । जलाशयेषु चक्राह्वहंससारसराजिषु ॥ ३ ॥ गोभूतिलहिरण्यानि शयनान्यासनानि च । ददुर्दानानि विप्रेभ्यो भाजनान्यंशुकानि च ॥ ४ ॥ हेमरत्नविचित्रेषु स्वेषु चामरसद्मसु । आनर्चुरच्युतेशानहुताशार्कादिकान्सुरान् ॥ ५ ॥ पुत्रपौत्रसुहृद्भृत्यबन्धुमित्रगणैः सह । तत आस्वादयामासुर्भोजनान्युचितानि वै ॥ ६ ॥ एतस्मिन्समये चास्मिन्नगरे दिवसोऽभवत् । तनुरष्टाङ्गशेषत्वाद्दृष्टो न च मनोहरः ॥ ७ ॥ सायन्तनदिनान्तं ते तत्कालोचितचेष्टया । अनयन्नंशुभिः सार्धं यावदस्तं ययौ रविः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी, श्रीरामचन्द्रजी, अन्यान्य राजाओं, मुनियों ओर द्विजातियों ने अपने घरों मे, गलियों मे ओर बाहर करने योग्य अपने-अपने कार्य निम्नलिखित रीति से किये | कमल, कह्लार, कुमुद तथा उत्पलों से मनोहर ओर चक्रवाक, हंस तथा सारसो की पंक्तियों से युक्त जलाशयो में उन लोगों ने स्नान किया । गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, शय्या, आसन, वर्त्र, बर्तन आदि का दान ब्राह्मणों को दिया । सुवर्णं ओर मणियों से अद्भुत देवालया में और अपने घरों मे विष्णु, शंकर तथा अग्नि, सूर्य आदि देवताओं की पूजा की । तदनन्तर इन लोगों ने पुत्र, पौत्र, सखा, चाकर और बन्धु- बान्धवं के साथ अपने अनुरूप भोजन किया । उस समय उस नगर में केवल अष्टम भाग शेष रहने से दिन सूक्ष्म हो गया था, अतएव वह देखने में अच्छा मालूम पडता था । सायंकाल तक का समय उन्होने तब तक उस समय के उचित पुराण, धर्मशास्त्र के अवलोकन आदि कर्म से बिताया, जब तक कि भगवान सूर्य अपनी किरणों के साथ अस्त नहीं हो गये