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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, Verse 40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 2, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

कृतमतिं शतशो विचारितं यद्यदि तदुपैति न मानसस्य बुद्धिः । भवति तदफलं शरद्धनाभं सततमतो मतिरेव कार्यसारः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि मन की पहले प्रार्थना की गई है, उसी से चारों प्रकरणों के अर्थके अवधारण की सिद्धि हो गई फिर उससे पृथक्‌ मति की क्यो प्रार्थना की जाती है ? तो इस पर कहते हैं। मन से सैकड़ों बार जो वस्तु विचारित होती है, उसे यदि बुद्धि स्वीकार न करे, तो वह भलीभाँति विचारित हुई भी शरत्काल के मेघ के समान स्थिर नहीं रहती, अतः श्रवण द्वारा तत्त्व का विचार होने पर भी मनन द्वारा सम्पादित निश्चयात्मिका बुद्धि ही कर्तव्य सम्पादन में समर्थ होती है, इसलिए पुन: मति की प्रार्थना उचित ही हे